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रविवार, 14 अप्रैल 2013

आखिर क्या करूँ

सूखे पत्तों के ढेर में तब्दील हुए ख्वाब मेरे

जला  दूँ  या सहेज लूँ  बोरे  में भर कर
शायद काम आ जाएं किसी नम रात में
अतीत की रोटियाँ सेकने के लिए

या कभी जला कर इन्हें
ठंडे  पड़े रिश्तों  में नई गर्मी भर सकूँ
या उड़ा  दूँ हवा में की ये बिखर जाएँ हर ओर
जैसे अभी अभी टूटकर कोई ख्वाब बिखरा हो

या पड़े रहने दूँ  इन्हें जस के तस
ताकि नियति जो चाहे कर सके इनके साथ
जैसा की वो आज तक करती आई  है

आखिर क्या करूँ -
जला दूं या सहेज लूँ बोरे में भरकर ?

1 टिप्पणी:

  1. वाह . बहुत उम्दा,
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