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रविवार, 21 जुलाई 2013

रेत पर लिखा

अब तो ज़िन्दगी भी मुझे 

मेरे हाल से पहचानती है
अफ़सोस! मेरे आईने ने
मेरा चेहरा भुला दिया

जहाँ सजते-उजड़ते रहे
कई मेले रिश्तों के
मैंने भी अपनी यादों का
एक कुनबा बसा दिया

लहरें भी नहीं आतीं
इस दिल के समंदर में
मैंने हाथों से ही अपने
रेत पर लिखा मिटा दिया

तेरे बगैर जीने का
जो वादा किया मैंने
झूठी मुस्कानें आज़ाद हैं
अश्कों पे ताला लगा दिया।

3 टिप्‍पणियां:

  1. जो वादा किया मैंने
    झूठी मुस्कानें आज़ाद हैं
    अश्कों पे ताला लगा दिया।
    ..........वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा
    आपने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आभारी हूं

    उत्तर देंहटाएं
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    1. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
      कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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