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शुक्रवार, 24 जून 2016

तुम्हें क्या लगता है

हिन्दी कविता Hindi Poem - अनुगूँज

तुम्हें क्या लगता है
यूँ हाथ झटक कर चले जाओगे
और ये रिश्ता टूट जायेगा
जो बना है
कई रिश्तों को ताक पर रख कर?

तुम्हें क्या लगता है
क्या इतना आसान है
पेड़ की जड़ों से
मिट्टी निकाल लेना
या
बारिश से, झरनों से,
हवा से
संगीत मिटा देना?

तुम्हें क्या लगता है
लहरें तटों से
गुस्से में टकराती हैं
या
भौंरे फूलों को
चोट पहुंचाते हैं?
ये धरती, सूरज, चाँद
भी हम जैसे हैं
ग्रहण तो लगता है
रिश्ते नहीं टूटते

पता है? मुझे लगता है
ये ग्रहण भी मिट जायेगा
और ये पेड़, मिट्टी, बारिश, झरने, हवा
ये भौंरे, ये फूल
सभी अपने-अपने रिश्तों में रम जाएंगे

और हम चल रहे होंगे
इनके बीच, फिर से
हाथों में हाथ लिए
तुम्हे क्या लगता है?

रविवार, 3 अप्रैल 2016

तू क्यों ना माने पगली तू क्या है

अंधियारे से इस गगन में
हिचकोले खाते जीवन में
उम्मीदों की है तू बदली और क्या है
तू क्यों ना माने पगली तू क्या है

रत्न भरें हों रतनालय में
भले जड़े हों देवालय में
कोहिनूर है तू ही असली और क्या है
तू क्यों ना माने पगली तू क्या है

सात जनम की बात न जानूँ
हस्त गणित की बात न मानूँ
जिंदगी तू ही अगली पिछली और क्या है
तू क्यों ना माने पगली तू क्या है

मुस्कानों के मोती ले ले
आँखों की ये ज्योति ले ले
निर्मल सरल हृदय ये तेरा
शरारत वाली बातें ले ले

प्रमाणों का ढ़ेर है पगली और क्या है
फिर भी क्यों ना माने पगली तू क्या है

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

कुण्डलिया:शिक्षा

कहने को तो दे दिया, शिक्षा  का अधिकार। 
लेकिन दूषित हो रहा, बच्चों का आहार।
बच्चों का आहार, तरीका नहीं स्वदेशी। 
करते वाद-विवाद, सभी हैं इसमें दोषी।
कितने हैं बेहाल, यहीं पर अब रहने दो।
नैतिकता रह गयी, यहाँ केवल कहने को।।