Blogoday


CG Blog

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

साथ चलेंगे

अब जो हंसकर थाम लिया है
हाथ तुम्हारा, साथ चलेंगे
बीते किस्से बीत चूके हैं
करने नई शुरुआत चलेंगे

ऋतु कोई भी आये जाये
जो भी हों हालात चलेंगे
सर्द हवा के झोंके हों
या गर्मी और बरसात चलेंगे

कल ना जाने क्या हो जाये
सपनें सारे ना खो जाएं
अंजाने से डर भी होंगे
मन में कई सवालात चलेंगे

डर ये सारे छोड़ के पीछे
हाथों में ले हाथ चलेंगे
धरती और सूरज के जैसे
मिलकर हम दिन रात चलेंगे

अब जो हंसकर थाम लिया है
हाथ तुम्हारा, साथ चलेंगे।

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

जो तू मिला

जो तू मिला तो मैं मिला
जो तू चला संग मैं चला
गर तू गया तो जान ले
मर भी गया मिट भी गया

ज़िद ये नहीं ज़ज्बात है
तुझसे ही अब हर बात है
तू रौशन सवेरा है बना
खुशियों की ये शुरुआत है

तकलीफ में थी ज़िन्दगी
भूला  था मैं तो बन्दगी
मुस्कान तेरी देखकर
उम्मीद फिर से है जगी

बन जा तू मेरा इस दफ़ा
मत बैठ मुझसे यूँ ख़फ़ा
हाथों में दे दे हाथ तू
ले तेरी हुई मेरी वफ़ा

गर तू गया तो जान ले
मर भी गया मिट भी गया। 

नींद क्यूँ है लापता

आँखों में बैठी है थकन
सपने भी तेरे हैं पले
पलकें झुकीं हैं बोझ से
पर नींद क्यूँ है लापता

जाने भटकता हूँ कहाँ
इस ओर से उस ओर तक
अब दूर इतनी आ गया
कि ढूँढू खुदका ही पता

अब क्या करूँ कुछ तो बता
दे दे कोई तू आसरा
तू साथ चलता है तो चल
मिल जायेगा कोई रास्ता। 

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

प्यार हम करते रहें

यूँ हवा चलती रहे
और साथ हम चलते रहें
खामोशियाँ हों हर तरफ
बस बात हम करते रहें

हर ग़म फ़ना कर ज़िन्दगी से
और शिकन माथे से हटा
बस अविरल मुस्कान की
बरसात हम करते रहें

सागर मचलता ही रहे
और लहरों पे संगीत हो
खोये रहें एक दूसरे में
कई ज़ज्बात यूँ पलते रहें

कुछ हसीं यादें चुनें
कुछ बोल मीठे बोल लें
संग रात भी चलती रहे
और प्यार हम करते रहें

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

प्रण

प्रण तेरा जरुरी है

बड़ी लम्बी वो दूरी है
विजयपथ है बहुत दुर्गम
शिलाएं तोड़ता तू चल

है तो रहने दे जीवन को एकांकी
नदी के विरुद्ध तैरना ही है तैराकी
अटल तू है, अडिग तू है
धाराएं मोड़ता तू चल

रास्तों से बात तू कर ले
दोस्ती कर तू हवाओं से
कीमत पहचान ठोकरों की
रिश्ते जोड़ता तू चल

सहज हो जायेगा जल्दी
उपाय एक बस कर ले
बीती बातें, बीते किस्से
पीछे छोड़ता तू चल

विजयपथ है बहुत दुर्गम
शिलाएं तोड़ता तू चल


सोमवार, 16 दिसंबर 2013

क्या कहने!

मोहब्बत में कही बातों के क्या कहने

बाद इन्तेज़ार के मुलाक़ातों के क्या कहने

शहर हो और जुदा होना पड़े फिर से
इस डर से आँखों में कटी रातों के क्या कहने

टकराती गर्म साँसों की तासिर से
मोम से पिघलते जज्बातों के क्या कहने

वो तेरी जाने कि ज़िद और मेरे मनाने की हद
तब बेवक़्त आतीं उन बरसातों के क्या कहने

अब है दर्द, गम, तन्हाई, रुसवाई
चाहत में मिले इन सौगातों के क्या कहने।

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

चाहत का ज़माना

आँखों में हैं बहते सपने
नींदों का उड़ जाना इस तरह

जाड़े की  सर्द हवाओं का
दिल को छू जाना इस तरह

यादों से मन को भिगोने
बेमौसम बारिश का आना इस तरह

भोर की किरणों के संग ही
चिड़ियों का गाना इस तरह

धड़कनें भी लय में आयीं
साँसों का आना जाना इस तरह

यूँ लगता है मानो आया
चाहत का ज़माना इस तरह।