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मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

राजीव के 'फूल'

हिये चोट ना राखिये, मन पर मन भर भार।
धरा चीर ऊपर निकले, तरु धरे आकार ।।

मीठा-मीठा जग कहे, छिपी तेज तलवार।
दो लोचन पीछे धरो, बचे पीठ का वार ।।

प्रसून प्यारे भ्रमर को, जुगनू को है रात।
अपने हिस्से में दर्द, अपनी अपनी बात ।।

निद्रा ही संसार है, सूने होश हवास।
सपने उड़ते देखिये, खग बन बन आकाश ।।

विरह वेदना से भरी, बैठी लेकर आस।
साजन सरहद पर डटे, जीतेगा विश्वास ।।

फलीभूत जब धारणा, मन में रहे उमंग।
गाँधी होते खुश वहाँ, सब मिल रहते संग ।।





बसंत आने वाला है

पतझड़ नीरस नहीं है
पतझड़ बेकार नहीं है
बसंत भी आता है
पतझड़ ही तो हर बार नहीं है

पतझड़ कहता है -
मैं पारदर्शी हूँ
तुम भी पारदर्शी कहलाओ
जो तुम्हारे अंदर है
वही बाहर भी दिखे
ऐसी छवि बनाओ

पतझड़ कहता है -
तैयारियाँ करो स्वागत की
बसंत आने वाला है
मैं जा रहा हूँ
मेरा अंत आने वाला है

होने वाली है सुबह
देखो नया कल आने वाला है।

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

साथ चलेंगे

अब जो हंसकर थाम लिया है
हाथ तुम्हारा, साथ चलेंगे
बीते किस्से बीत चूके हैं
करने नई शुरुआत चलेंगे

ऋतु कोई भी आये जाये
जो भी हों हालात चलेंगे
सर्द हवा के झोंके हों
या गर्मी और बरसात चलेंगे

कल ना जाने क्या हो जाये
सपनें सारे ना खो जाएं
अंजाने से डर भी होंगे
मन में कई सवालात चलेंगे

डर ये सारे छोड़ के पीछे
हाथों में ले हाथ चलेंगे
धरती और सूरज के जैसे
मिलकर हम दिन रात चलेंगे

अब जो हंसकर थाम लिया है
हाथ तुम्हारा, साथ चलेंगे।

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

जो तू मिला

जो तू मिला तो मैं मिला
जो तू चला संग मैं चला
गर तू गया तो जान ले
मर भी गया मिट भी गया

ज़िद ये नहीं ज़ज्बात है
तुझसे ही अब हर बात है
तू रौशन सवेरा है बना
खुशियों की ये शुरुआत है

तकलीफ में थी ज़िन्दगी
भूला  था मैं तो बन्दगी
मुस्कान तेरी देखकर
उम्मीद फिर से है जगी

बन जा तू मेरा इस दफ़ा
मत बैठ मुझसे यूँ ख़फ़ा
हाथों में दे दे हाथ तू
ले तेरी हुई मेरी वफ़ा

गर तू गया तो जान ले
मर भी गया मिट भी गया। 

नींद क्यूँ है लापता

आँखों में बैठी है थकन
सपने भी तेरे हैं पले
पलकें झुकीं हैं बोझ से
पर नींद क्यूँ है लापता

जाने भटकता हूँ कहाँ
इस ओर से उस ओर तक
अब दूर इतनी आ गया
कि ढूँढू खुदका ही पता

अब क्या करूँ कुछ तो बता
दे दे कोई तू आसरा
तू साथ चलता है तो चल
मिल जायेगा कोई रास्ता। 

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

प्यार हम करते रहें

यूँ हवा चलती रहे
और साथ हम चलते रहें
खामोशियाँ हों हर तरफ
बस बात हम करते रहें

हर ग़म फ़ना कर ज़िन्दगी से
और शिकन माथे से हटा
बस अविरल मुस्कान की
बरसात हम करते रहें

सागर मचलता ही रहे
और लहरों पे संगीत हो
खोये रहें एक दूसरे में
कई ज़ज्बात यूँ पलते रहें

कुछ हसीं यादें चुनें
कुछ बोल मीठे बोल लें
संग रात भी चलती रहे
और प्यार हम करते रहें

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

प्रण

प्रण तेरा जरुरी है

बड़ी लम्बी वो दूरी है
विजयपथ है बहुत दुर्गम
शिलाएं तोड़ता तू चल

है तो रहने दे जीवन को एकांकी
नदी के विरुद्ध तैरना ही है तैराकी
अटल तू है, अडिग तू है
धाराएं मोड़ता तू चल

रास्तों से बात तू कर ले
दोस्ती कर तू हवाओं से
कीमत पहचान ठोकरों की
रिश्ते जोड़ता तू चल

सहज हो जायेगा जल्दी
उपाय एक बस कर ले
बीती बातें, बीते किस्से
पीछे छोड़ता तू चल

विजयपथ है बहुत दुर्गम
शिलाएं तोड़ता तू चल